ना पता तुम्हे, ना पता हमे
अक्कड बक्कड करते करते कब हम,
अ आ इ ई सीख गए।
हा हा ही ही करते करते कब हम,
घुलना मिलना सीख गए।
ना ना करते करते कब हीरे धीरे जीत गए।
ना पता तुम्हे ना पता हमे,
हम बङे कब और कैसे हु?
आँख मिचौली के खेल से कब हम,
ठग्गी करना सीख गए।
स्कूल ना जाने के मन के मारे कब हम,
झूटी नींदे सोने लगे।
हँसी ठिठोली के चक्कर मे कब हम,
काम कि बात तो भूल गए।
बात बनाते बनाते कब हम,
झूठ बोलना सीख गए।
ना पता तुम्हे, ना पता हमे,
दुनिय़ादारी से कब और कैसे जुडे?
मन से चलते चलते कब हम,
सही गलत ही भूल गए।
सही गलत कि समझ मे कब हम,
अपना पक्ष ही भूल गए।
इधर उधर कि चिंता मे कब हम,
तनाव मे रहना सीख गए।
तनाव से बचने खातिर कब हम,
आवाज़ उठाना भूल गए।
ना पता तुम्हे, ना पता हमे,
हम नाप तोल कब सीख गए।
धीरे धीरे खव्ामोशी से हम,
ना जाने कब सब सीख गए,
बस यही देखना बाकी हैै अब,
पाठ बचे हैं बाकी क्या कुछ
जिन्हे अभी सीखना बाकी है।
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